नेशनल, 1 जुलाई 2026: कोक स्टूडियो भारत सीज़न 4 का अपना चौथा गाना लेकर आया है। इस बार यह सफर कश्मीर की वादियों तक पहुँचा है। नए गाने का नाम है ‘हूर’ जोकि एक ऐसी लोककथा पर आधारित है जो कश्मीर की सदियों पुरानी कहानियाँ सुनाने की परंपरा से जुड़ी है, जहाँ संगीतकार महफिलों में बैठकर राजाओं, प्रेमियों, पथिकों और रहस्यमय आत्माओं की कहानियाँ गाकर सुनाया करते थे। कोक स्टूडियो भारत ने हूर के साथ आज के जमाने के गायकों के सहयोग में भारत की समृद्ध लोक एवं क्षेत्रीय संगीत परंपराओं को सुर्खियों में लाने का अपना सफर जारी रखा है।

यह गाना कश्मीरी कहानियों और ‘अफ़साना गोरी’ की रूहानी भावना से प्रेरित है। इसमें ‘शेख’ और ‘हूर’ नाम के दो किरदारों का सफर संगीत और बातचीत के ज़रिए दिखाया गया है। प्यार, जुदाई और भक्ति के रंगों से सजी यह कहानी कश्मीरी लोककथाओं जैसी जादुई लगती है। इन सब चीज़ों को गाने में बहुत ही खूबसूरत आवाज़ों, कश्मीरी म्यूज़िक और रॉक म्यूज़िक के साथ मिलाया गया है, ताकि पुरानी परंपरा भी बची रहे और आज की पीढ़ी को भी यह पसंद आए।
इस कहानी को दर्शकों तक पहुँचाने वाले कलाकार हैं: सिंगर और गीतकार फहीम अब्दुल्ला, कंपोजर, अर्सलान निजामी, और कंपोजर व सिंगर उस्ताद कैसर निजामी। कश्मीर की संगीत के ज़रिए कहानी सुनाने की परंपरा से प्रेरित होकर बना यह गाना ‘हूर’, कभी बातचीत तो कभी धुन के बीच घूमता है, जिससे ऐसा लगता है जैसे कोई लाइव महफिल चल रही हो।
भले ही यह गाना एक पुरानी कश्मीरी लोककथा की पृष्ठभूमि पर बना है, लेकिन इसका म्यूज़िक बिल्कुल आज के ज़माने का है। इसकी वजह से यह कहानी आज की लगती है, पर साथ ही इसमें कश्मीर की पुरानी परंपरा का एहसास और जज़्बात भी बने रहते हैं। गाने के आखिरी हिस्से में कश्मीरी भाषा की कुछ लाइनें हैं, जो इस कहानी को पूरी तरह से कश्मीर की मिट्टी से जोड़ देती हैं।
कोक स्टूडियो भारत ने अपने हर सीज़न में भारत के अलग-अलग राज्यों के संगीत की खूबसूरती को दिखाया है। इसके लिए वे ऐसे कलाकारों के साथ काम करते हैं जो हमारी सांस्कृतिक कहानियों को आज के दर्शकों के हिसाब से नए अंदाज़ में पेश करते हैं, लेकिन उनकी मूल आत्मा को मरने नहीं देते। ‘हूर’ गाना भी इसी सफर को आगे बढ़ाता है और कश्मीर की एक खूबसूरत लोककथा को हर पीढ़ी और हर जगह के सुनने वालों तक पहुँचाता है।
कोका-कोला इंडिया और साउथवेस्ट एशिया के आईएमएक्स लीड, शांतनु गांगने ने कहा, “कोक स्टूडियो भारत में हमारा मानना है कि भारत की सबसे दमदार कहानियाँ यहाँ के अलग-अलग क्षेत्रों से निकलती हैं, जो वहाँ की संस्कृति, यादों और असल ज़िंदगी के अनुभवों से बनी होती हैं। कश्मीर की कहानी सुनाने की परंपरा की अपनी एक अलग ही भावुक और शायराना विरासत है। ‘हूर’ गाने के साथ हम इसी असली अंदाज़ का सम्मान करना चाहते थे और इसे आज के दर्शकों के हिसाब से नए रूप में पेश करना चाहते थे। फहीम, अर्सलान और कैसर ने इस कहानी में एक गहरा जादू डाला है। इसका म्यूज़िक ऐसा है कि यह गाना सीमाओं को पार कर हर जगह पहुँच सकता है, वो भी अपनी असली पहचान खोए बिना। यह गाना भारत की सांस्कृतिक विविधता का जश्न मनाने और इसे हर पीढ़ी के लिए खास बनाने के हमारे भरोसे को सच करता है।”
फहीम अब्दुल्ला ने कहा, “‘हूर’ गाने की कहानी ने ही मुझे इस तरफ खींचा। यह एक ऐसी परंपरा से आता है जो कश्मीर में पीढ़ियों से चली आ रही है, जहाँ कहानियों को म्यूज़िक के ज़रिए ज़िंदा रखा जाता है और एक आवाज़ से दूसरी आवाज़ तक पहुँचाया जाता है। कोक स्टूडियो भारत की मदद से हमें इस परंपरा को बड़े पैमाने पर लोगों के सामने लाने का मौका मिला, वो भी मूल कहानी के अहसास को बिना बदले।”
अर्सलान निजामी ने कहा, “कश्मीरी लोक संगीत जिस तरह से बातचीत और धुन के बीच बदलता है, वैसा मुझे कहीं और देखने को नहीं मिलता। कोक स्टूडियो भारत के ज़रिए हम इस संगीत की परतों को पूरी सच्चाई के साथ टटोल पाए। हमने परंपरा के अंदाज़ को भी बचाए रखा और उसमें अपना म्यूज़िक भी जोड़ा। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर संगीत में यह आज़ादी मिलना ही ‘हूर’ गाने पर काम करने को इतना खूबसूरत बनाता है।”
उस्ताद कैसर निजामी ने कहा, “हूर गाना सुनते हुए ऐसा लगता है जैसे कोई कहानी बिल्कुल आपके सामने, उसी पल सुनाई जा रही हो। कश्मीर में महफिलों का संगीत हमेशा से ऐसा ही रहा है, जहाँ कमरे में बैठा हर इंसान सांस रोककर बस यह इंतज़ार करता है कि आगे क्या होने वाला है। जब कोई गाना बड़े मंच पर जाता है, तो महफिल का यह करीबी और अपना सा अहसास अक्सर खो जाता है। लेकिन कोक स्टूडियो भारत ने इस बात को समझा कि इस अहसास को बचाकर रखना बेहद ज़रूरी था, न कि इसे प्रोडक्शन के भार में खो जाने देना।”
‘हूर’ गाने के साथ कोक स्टूडियो भारत सीज़न 4 भारत की लोक और क्षेत्रीय परंपराओं के सफर को आगे बढ़ा रहा है, और हर परंपरा में एक ऐसी कहानी ढूंढ रहा है जिसे दोबारा सुनाया जाना चाहिए। ‘ऐ अजनबी’, ‘बुल्लेया वे’ और ‘कचौड़ी गली’ के बाद, इस सीज़न ने अपने बढ़ते गानों के कलेक्शन में एक और अनोखी आवाज़ जोड़ ली है, इस बार कश्मीर की वादियों से, और एक ऐसी भाषा में जो अपने भीतर सदियों का संगीत समेटे हुए है।